"78 साल बाद… क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?"
देश की आज़ादी के 78 वर्ष पूरे हो गए हैं। हर साल हम गर्व से तिरंगा फहराते हैं, शौर्यगाथाएं सुनते हैं, और बलिदानियों को नमन करते हैं। लेकिन इस गर्व के बीच एक कड़वा सच यह भी है कि हम धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता की गरिमा और उसकी मूल भावना खोते जा रहे हैं।
आज़ादी केवल आर्थिक स्वतंत्रता का नाम नहीं है। जब तक समाज में हर वर्ग को समान अधिकार और सम्मान नहीं मिलता, तब तक कोई भी राष्ट्र पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं कहलाता। सामाजिक समानता की आज़ादी, हर व्यक्ति के आत्मसम्मान की रक्षा, और न्याय की समान पहुंच—यही स्वतंत्रता की असली आत्मा है।
दुर्भाग्य से, स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संसद की गरिमा भी निरंतर गिर रही है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—दोनों अपनी जवाबदेही निभाने में विफल हो रहे हैं। सत्ता पर बने रहना ही राजनीति का मूल उद्देश्य बन चुका है, जो हमारी आज़ादी की आत्मा के खिलाफ है।
आज जाति-आधारित राजनीति, क्षेत्रवाद और समाज में बढ़ती विभाजनकारी सोच राष्ट्र की एकता के लिए खतरा बन चुकी है। राजनीति का अपराधीकरण और अपराधीकरण की राजनीति—दोनों ही हमारे लोकतंत्र में गहराई तक पैठ बना चुके हैं। संवैधानिक संस्थाएं भी राजनीतिक दबाव में अपनी स्वायत्तता गिरवी रख चुकी हैं।
इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल तिरंगा लहराने भर से संतोष नहीं करना चाहिए। हमें उस मूल भावना को पुनर्जीवित करना होगा जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे—समानता, न्याय और सच्ची स्वतंत्रता की भावना। जब तक हम इन मूल्यों को फिर से स्थापित नहीं करते, तब तक हमारे 78 साल केवल एक कैलेंडर का आंकड़ा भर रह जाएंगे।
– सूरज जायसवाल
प्रधान संपादक, जनता समाचार.न्यूज
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