भूख और गरीबी से जूझ रहा अफगानिस्तान, इंसानियत को झकझोर रही तस्वीरें
अफगानिस्तान: भुखमरी, कमरतोड़ गरीबी और बदहाली के चक्रव्यूह में फंसे अफगानिस्तान में मानवीय संकट हर बीतते दिन के साथ और गहराता जा रहा है। वैश्विक मीडिया और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में देश के भीतर उपजे इस भयावह हालात की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। इन रिपोर्टों के अनुसार, अफगानिस्तान के सुदूर और ग्रामीण इलाकों में अत्यंत गरीब परिवार दाने-दाने को मोहताज हैं। नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि अपने परिवार का पेट पालने, गंभीर बीमारियों का इलाज कराने या कर्जदारों से जान छुड़ाने के लिए बेबस माता-पिता अपने ही मासूम बच्चों का सौदा करने पर मजबूर हो गए हैं।
तीन-चौथाई आबादी बुनियादी जरूरतों से महरूम
ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि बच्चों को बेचने की ये दर्दनाक घटनाएं अब कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं रह गई हैं, बल्कि यह पूरे देश में फैले एक व्यापक संकट की बानगी हैं। आज अफगानिस्तान की लगभग तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) आबादी दो वक्त की रोटी और पीने के साफ पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है। देश में छाई भयानक मंदी, चरम बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय मदद में हुई भारी कटौती ने परिवारों को अपनी ही बेटियों को बेचने जैसा अकल्पनीय और आत्मघाती कदम उठाने पर विवश कर दिया है। इसके अलावा, तालिबान शासन द्वारा महिलाओं और किशोरियों पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने इस सामाजिक और आर्थिक संकट को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है।
इलाज के खर्च के लिए 5 साल की मासूम का सौदा
अफगानिस्तान के घोर प्रांत से सामने आई एक बेहद भावुक कर देने वाली कहानी में एक पिता की बेबसी को साफ देखा जा सकता है। सईद अहमद नाम के एक शख्स ने बताया कि उसकी पांच साल की मासूम बेटी 'शाइका' लिवर सिस्ट और अपेंडिक्स जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी से पीड़ित थी। अस्पताल में उसकी सर्जरी के लिए भारी-भरकम रकम की जरूरत थी। कोई और रास्ता न देख, सईद ने अपनी बेटी को ही बेच दिया। हालांकि, उसने खरीदार के सामने यह शर्त रखी कि वे बच्ची को तब तक अपने साथ नहीं ले जा सकते जब तक कि उसका पूरा इलाज नहीं हो जाता। शाइका की सर्जरी तो कामयाब रही, लेकिन इसके लिए एक पिता को 200,000 अफगानी (लगभग 3,200 अमेरिकी डॉलर से कम) में अपनी ही संतान का सौदा करना पड़ा।
बच्चों में कुपोषण और मृत्यु दर में भारी उछाल
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का अनुमान है कि इस समय अफगानिस्तान में करीब 50 लाख (5 मिलियन) लोग आपातकालीन स्तर की भुखमरी का सामना कर रहे हैं। देश का स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है, अस्पतालों में न दवाइयां हैं और न ही जरूरी जीवनरक्षक उपकरण। इसके चलते बच्चों में कुपोषण की दर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है और शिशु मृत्यु दर में लगातार रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। राहत पहुंचाने वाली विदेशी संस्थाओं का बजट सिकुड़ जाने से जमीनी स्तर पर मदद नाममात्र की रह गई है।
"दूसरे बच्चों को भूख से तड़पकर मरते नहीं देख सकते"
संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, कई लाचार माता-पिता अपने अन्य बच्चों को भूख से तड़पकर मरने से बचाने के लिए एक बच्चे को बेचने के इस गणित को ही आखिरी रास्ता मानते हैं। एक अन्य परेशान पिता ने अपनी 7 साल की जुड़वां बेटियों, रोकिया और रोहिला का हवाला देते हुए कहा कि वह कर्ज के बोझ तले इस कदर दबा हुआ है कि वह अपनी बेटियों को भी बेचने के लिए तैयार है ताकि बाकी परिवार जिंदा रह सके। 2021 और 2022 के दौरान भी ऐसी कई रिपोर्ट्स आईं, जिनमें सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में माताओं द्वारा अपने नवजात शिशुओं को किसी निःसंतान दंपत्ति या दलालों को बेचने के वीडियो और फुटेज वैश्विक स्तर पर वायरल हुए थे, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।
80 प्रतिशत से ज्यादा परिवार कर्ज के दलदल में
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि:
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अफगानिस्तान के 80 प्रतिशत से अधिक परिवार इस समय कर्ज के जाल में पूरी तरह फंस चुके हैं।
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लगातार पड़ने वाले सूखे, विदेशी सहायता पर रोक और तालिबान की वापसी के बाद देश की वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह ढह चुकी है, जिससे 23 से 30 मिलियन लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।
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एक ताजा आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में अफगानिस्तान के करीब 28 मिलियन लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं।
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देश की जनसंख्या वृद्धि दर जहां 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, वहीं वास्तविक जीडीपी विकास दर घटकर महज 1.9 प्रतिशत रह गई है, जिसके चलते प्रति व्यक्ति आय में भारी गिरावट आई है और अत्यधिक गरीबी अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि वहां की जनता की रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है।
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