संपादकीय

सूरज जायसवाल, प्रधान संपादक, जनता समाचार.न्यूज।

देश के वरिष्ठ नेता, पांच राज्यों के पूर्व राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सत्यपाल मलिक का हाल ही में निधन हो गया। उनके सार्वजनिक जीवन का विस्तार दशकों तक फैला रहा — वे विभिन्न दलों से जुड़े रहे लेकिन हमेशा राष्ट्रहित और जनहित को प्राथमिकता दी। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में राज्यपाल रहते हुए उन्होंने जिस साहस और पारदर्शिता से अपनी जिम्मेदारी निभाई, वह उन्हें एक बेबाक, जनपक्षधर और संवैधानिक मर्यादाओं के सजग प्रहरी के रूप में स्थापित करती है।

ऐसे समय में जब राष्ट्र अपने नागरिकों को उनके योगदानों के लिए अंतिम विदाई में सम्मान देता है, सत्यपाल मलिक जैसे वरिष्ठ राजनेता को मरणोपरांत राजकीय सम्मान न दिया जाना न केवल दुखद है बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। यह निर्णय सरकार की उस प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसमें असहमति रखने वालों को अनदेखा करना या उनका अपमान करना एक तरह की ‘नवीन परंपरा’ बनती जा रही है।

सत्यपाल मलिक ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सत्ता के खिलाफ बोलने का साहस दिखाया। उन्होंने किसानों के मुद्दों पर मुखर होकर सरकार की नीतियों की आलोचना की। यह किसी भी लोकतंत्र में एक स्वस्थ परंपरा का हिस्सा होना चाहिए, लेकिन उनके साथ हुए व्यवहार से यह प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत असहमतियों को सरकार ने राजकीय सम्मान से वंचित करने का आधार बना लिया।

यह न केवल व्यक्तिगत दुश्मनी को दर्शाता है बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का भी अपमान है। यह सवाल केवल सत्यपाल मलिक के सम्मान का नहीं है, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी है जिसमें हम सब विश्वास करते हैं।

आज देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो सत्ता से प्रश्न पूछ सकें, जनभावनाओं को स्वर दे सकें और संविधान की रक्षा कर सकें। सत्यपाल मलिक ने यह भूमिका पूरी निष्ठा से निभाई — और उनके साथ किया गया यह व्यवहार हमें चेतावनी देता है कि यदि हम चुप रहे, तो कल किसी भी असहमति की आवाज को दबा दिया जाएगा।

जनता समाचार परिवार और समस्त लोकतंत्र-प्रेमी नागरिक इस उपेक्षा की निंदा करते हैं और सरकार से अपेक्षा करते हैं कि वह राजनीतिक असहमतियों से ऊपर उठकर संविधान के अनुरूप निर्णय लेने की परिपक्वता दिखाए।