सनातन अपनाकर साध्वी बनीं, सड़क के लिए 6 साल तक रखा उपवास
गोपालगंज। बिहार के गोपालगंज से श्रद्धा, संघर्ष और जनसेवा की एक अनोखी कहानी सामने आई है, जो सांप्रदायिक सौहार्द और समर्पण की मिसाल बन गई है। कभी मुस्लिम परिवार में जन्मी आसमा खातून आज बउक दास के नाम से जानी जाती हैं। उनका जीवन धर्म परिवर्तन, निजी संघर्ष और समाजसेवा की ऐसी यात्रा है, जिसने उन्हें क्षेत्र में एक साध्वी और जननेता के रूप में पहचान दिलाई है।
आसमा खातून से बउक दास बनने की यात्रा
पंचदेवरी प्रखंड के डेरवा गांव के एक मुस्लिम परिवार में जन्मी आसमा खातून का बचपन मदरसे और नमाज के बीच बीता। लेकिन बचपन से ही उन्हें मंदिर की घंटियों की आवाज आकर्षित करती थी। परिवार और धर्मगुरुओं के विरोध के बावजूद उनका झुकाव सनातन धर्म की ओर बढ़ता गया। करीब 30 साल पहले उन्होंने अपने अंतर्मन की आवाज सुनकर घर छोड़ दिया। बाद में उनकी मुलाकात फुलवरिया प्रखंड के मदरवानी गांव निवासी रामाकांत यादव से हुई, जिनसे प्रेम विवाह के बाद वे रामांती बन गईं। लेकिन यह सुखद समय अधिक लंबा नहीं रहा। रामाकांत की जेल में मृत्यु हो गई और परिवार ने भी उनका साथ छोड़ दिया। इसके बाद रामांती ने अकेले ही पति का अंतिम संस्कार किया और झरही नदी के किनारे जंगल में जीवन शुरू कर दिया। इसी एकांत और भक्ति के कारण लोगों ने उन्हें बउक दास नाम दिया।
जनसेवा के लिए किया अन्न का त्याग
बउक दास केवल साध्वी नहीं, बल्कि जनसमस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने वाली सामाजिक योद्धा भी हैं। करीब दो दशक पहले इलाके में आवागमन के लिए सिर्फ चचरी पुल था। लोगों की परेशानी देखकर उन्होंने झरही नदी में मचान बनाकर एक साल तक जल सत्याग्रह किया। उनके आंदोलन के बाद सरकार ने पुल का निर्माण कराया। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई। पुल बन गया, लेकिन संपर्क मार्ग कच्चा रह गया, जिससे बारिश में लोगों को भारी परेशानी होती थी। इसके विरोध में उन्होंने छह साल तक अन्न का त्याग कर दिया। उनकी शर्त थी कि जब तक पक्की सड़क नहीं बनेगी, वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगी। लंबे उपवास से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। बाद में सामाजिक लोगों की मदद से एक साल पहले गड्ढों में मिट्टी भरवाई गई, जिसके बाद उन्होंने फिर से अन्न ग्रहण किया।
पशु-पक्षियों से गहरा लगाव, बना ‘भाव आश्रम’
बउक दास ने जिस जंगल को साफ कर अपनी कुटिया बनाई, वहां अब एक शिव मंदिर और भाव आश्रम स्थापित है। उनकी आध्यात्मिकता का आलम यह है कि उनकी आवाज पर कौओं और अन्य पक्षियों का झुंड उनके पास आ जाता है। वे रोज अपने हाथों से पक्षियों को दाना खिलाती हैं। स्थानीय लोग उन्हें सिद्ध संत मानते हैं और उनके अनुयायी बन चुके हैं।
बउक दास का बयान
उन्होंने कहा, “मेरा जन्म ईश्वर की भक्ति के लिए हुआ था। भले ही मैं मुस्लिम परिवार में पैदा हुई, लेकिन मेरी आत्मा हमेशा सनातन की ओर रही। अब मेरा जीवन समाज और महादेव के चरणों में समर्पित है।” स्थानीय लोगों का कहना है कि एक महिला जिसने अपना पूरा जीवन समाजसेवा में लगा दिया है, आज भी अपने स्वास्थ्य और मूलभूत मांगों को लेकर संघर्ष कर रही है। लोगों ने प्रशासन से अपील की है कि बउक दास की सेहत और उनकी जायज मांगों पर तुरंत ध्यान दिया जाए।
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