सूरज जायसवाल सम्पादक

सोनम वंचिंग जैसी महान और संघर्षशील हस्ती को देशद्रोह के झूठे आरोपों में गिरफ्तार करना भारत के लोकतंत्र पर सीधा हमला है। यह कदम न केवल शर्मनाक है, बल्कि साफ तौर पर यह बताता है कि सत्ता असहमति की आवाज़ों को सहन करने की क्षमता खो चुकी है। लोकतांत्रिक देश में विचारों को कुचलने के लिए पुलिसिया डंडे का सहारा लेना लोकतंत्र नहीं, बल्कि तानाशाही का चेहरा है।

भारत हमेशा से विश्व मंच पर सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में पहचाना जाता रहा है। लेकिन सोनम वंचिंग की गिरफ्तारी ने देश की इस गौरवशाली पहचान को ध्वस्त कर दिया है। यह कार्रवाई भारत की लोकतांत्रिक छवि को कलंकित करती है और हमें एक तानाशाही शासन व्यवस्था की ओर धकेलती है। सत्ता द्वारा अपने आलोचकों को देशद्रोही करार देना न केवल संविधान का अपमान है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के उन बलिदानों की भी अवमानना है जिनकी वजह से यह देश लोकतांत्रिक गणराज्य बना।

सोनम वंचिंग की गिरफ्तारी से छात्रों, युवाओं और बुद्धिजीवियों में जबरदस्त आक्रोश है। यह आक्रोश केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी पर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की घुटती साँसों के खिलाफ विद्रोह की चेतावनी है। सत्ता को समझ लेना चाहिए कि विचारों को हथकड़ियों में नहीं जकड़ा जा सकता। जो आवाज़ें दबाई जाती हैं, वही सबसे ऊँची गूंज बनकर लौटती हैं।

यदि सरकार सचमुच लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती है, तो उसे तुरंत इस तरह की दमनकारी कार्रवाई से बाज आना चाहिए और सोनम वंचिंग को सम्मानपूर्वक रिहा करना चाहिए। अन्यथा यह इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा कि इस दौर में सत्ता ने लोकतंत्र की हत्या की और जनता ने उसके खिलाफ निर्णायक संघर्ष का बिगुल फूँका।